शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

वड़ोदरा में
















वड़ोदरा में उनको आना हुआ 1949 देश की आज़ादी हुई उसके करीब से। राज ज्योतिष थे उत्तर गुजरात के। अब यहाँ पंडितो में उन्होंने संस्कृत विद्वत सभा में कार्य में रत हुए । साथ साथ ज्योतिष की सेवा रही । उनके साथ महाशंकर भाई हरिशंकर जी उनके भाई परमानन्द भवानी शंकर सब ने मिलके शुरू किया था व्यास एंड कंपनी नामका व्यापर जिसमे दवाई यो एवं कागज खाने की चीजों का व्यापर भी था। किन्तु यह थोड़े साल चला ! अध्यात्मिक कार्य तो था ही। बोलुन्द्र में किये हुए अतिरुद्र में जो पूजा किया हुआ शिव लिंग था वह लेके आ ये थे। शरु में ભૂતડી ઝાંપા के पास देव ज्योतिशालय था । फिर वहा से शामल बेचार की पोल में । उनका नाम सुनके उनके वहा राज्कपोर और नर्गिस भी ज्योतिष दिखाने ए थे। यही सम्बन्ध से वो चेम्बूर भी पृथ्वीराज के बुलवाने पर गए थे। और उनका फोरकास्टिंग सही हुआ था । इसी बातो से उनकी विशिष्टता और बढ़ी थी और भ्रुगुसम्हिता का अधर ले कर पुर जिंदगी का फल लिखने की उनकी पद्धति ने बड़ा नाम बनाया था । करीबी १९६५ देव ज्योतिशालय को लेके ए थे बा रा न पूरा में ! फिर वहा से हरनी रोड पर !यही उनकी यात्रा ज्योतिष कार्यालय की रही ! यही काम उनके पुत्र राजेन्द्रप्रसाद सम्हाल रहे है। उनके पुत्र किरीट भा इ भी कर्मकांड एवं ज्योतिष के काम में है । उनकी रत्नपरीक्षा के गुण ने पुत्र राकेश को जेमोलोजी में खीचा है इस तरह यह सेवा जरी रही है । आज युनिवेर्सिटी ग्रांट कमीशन का ७३ नंबर का विषय ज्योतिष बना रहा है ।

ज्योतिष के साथ कर्मकांड पूजा मै कई बड़े काम हुए थे.जिनमे पशाभई ट्रेक्टर का प्रारंभ पूजा उन्होंने की थी जो आज हिंदुस्तान ट्रक्टर जैसी कंपनी है ।
यही था उनका ज्योतिष के प्रति दृष्टिकोण !!
देवज्योतिषालय को वड़ोदरा में लाये तब मिले पहले संस्कृत विद्यालय के प्रिंसिपल हरिप्रसाद महेता . जिनको  आगे चलके राष्ट्रपति से अवोर्ड मिला था उत्तम शिक्षक का !! उन्हीके हाथो से उद्घाटन हुआ वड़ोदरा में | यहाँ एक तस्वीर है जिसमे १९७१ में फॅमिली फोटो है |
मुझे  बिलकुल याद है उनमे श्रध्धा रखने वाले बहोत थे !! जो उनको गुरु मानते थे।  लेकिन गुरु ગાદી जैसा ન किया उन्होंने।  उनके आरोग्य के प्रश्न के कारण उनके एक शिष्य लक्मीनाथ  तिवारीजी  ने हम  बच्चो को बिठा कर उनके बदल भगवत सप्ताह किया था !यही उनके प्रति सद्भावनका प्रतिक है !!

वड़ोदरा   नाम पहेले  बड़ोदा  था।  अंग्रेजो ने बरोडा  कर दिया  था। पहले आये थे भतडी  ज़ाम्पा। फिर वहासे कार्य ले किया मांडवी के पास. विस्मणीय के खांचे मे. फिर आगे जाके चम्पाके पेड़ के पास विठ्ठल मंदिर के पीछे रहे देव ज्योतिषालय. उन दिनों में उनके पास आये  थे राजकपूर   नर्गिस !! ऐसे उनकी प्रसिद्धि बड़ी थी।
तीन मज़ले का मकान किराये पे था।  यहाँ से बरान पूरा  और उसके बाद हरणी  रोड पर कार्यालय लाया गया था।  जो आज राजेन्द्रप्रसाद व्यास अवं उनकी पुत्री जोषि  धारा  चला रहे है ! આજે કાર્યાલય ગેંડા સર્કલ પાસે ,ટ્રાયી કલર હોસ્પિટલ પાસે છે.

संस्कृत विद्वत सभा अवं पंडितो में बड़ा मान था  . कर्मकांड विषय में उनकी मास्टरी थी !
Manglaben જયશ્રી  हंसा  ભાવના  बहु के साथ 
વડોદરામાં આવ્યા ત્યારે દેશના ભાગલા થયેલા તેની તેમના પર ઘણી અસર હતી .તેથી સિંધી ભાઈ બહેનો પાસે થી ફી ન હતા લેતા. તેનું તેમને બોર્ડ ચિત્રવેલું.અમે નિરઆશ્રિત ભાઈ બહેનો પાસેથી ફી લેતા નથી.ઘણા સમય સુધી આ બોર્ડ હતું.જે તેમના એક અંગત ગ્રાહક પરમાનંદ લાખની એ કહ્યું કે હવે સિંધી ઓ સુખી છે હવે તો દક્ષિણા લો.એમ કહી બોર્ડ ખસેડી દીધેલ


પરમાનંદ લાખાણી




मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

शिव शिव


उनका जन्म हुआ तब नर सिंह दादा ने शिव की उपासना की थी । इसीलिए उनका नाम शिवशंकर रख्खा था ! वैसे तो उनकी जन्म राशी सिंह थी ! उन्हों ने खुद ने भी गाव के शिवालय में सतत धारा कर के अतिरुद्र करवाया था । कुटुंब में सबको वो दत्तबावनी शिवमहिम्न स्तोत्र एवं विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र सतत करवाते थे ! वो मानते थे की हम सब कोई अदृश्य शक्ति के निचे काम कर रहे है । उसकी मर्जी को मुनासिब समज कर आनंद से अपना कर्म करते रहो ।
 देव पंचायत की पूजा का महत्व कहते थे. नाम अक्षरों से   किसी  पंचायत से लाभ होगा यह निर्णय पर महत्व देते थे .

शनिवार, 16 जनवरी 2010

अंतिम चर्चा

उनके साथ हुई अध्यात्म चर्चा में प्रकाश का महत्त्व रहा है, जो उन्हें अपने अंत कालमें देखा हो ऐसा लगता है । ये सब देखते आश्चर्य मुद्रा में हंसते हुए विस्मय युक्त कोई बहोत बड़े विराट प्रकाश तेज को देखे हुए बावले से हुए थे !भूमा विद्या की यही पहचान होगी। परमात्म तत्त्व का अंश मात्रही आत्मा तत्त्व है ! जो इधर उधर सर्वत्र ज्यादा कम मात्रामें बिखरा है !जैसे अज्ञानके महासागर में कोई ज्ञान !अन्धकार में एक प्रकाश बूंद !और यह बूंद का फ़ैल जाना ! जैसे एक पानी भरे ग्लास में एक स्याही की बूंद कैसे फ़ैल जाती है !वैसे ही आत्मा का फ़ैल जाना है ! जैसे पेड़ की डाल ! भगवन बुध्ध का जन्म
हुआ तब वो सिध्धार्थ थे । उनके युवावस्था के बाद हुए ज्ञान ने उन्हें बुध्ध बनाया था । जब उनका जन्म हुआ तो राजाने ज्योतिषी पंडित को बुलाया और उनकी पत्रिका सुनी। पत्रिका को पढ़ते पढ़ते पंडित बड़ा हर्ष में आ गया । वो बोला राजा यह कोई सामान्य बालक नहीं है यह तो बड़ा चक्रवर्ती होगा या तो भगवन स्वरूप बनेगा ! बहोत खुश होते यह वर्णन करते और यह कहते कहते थोड़ी देर में पंडित रोने लगा !किन्तु थोड़े समय बाद पंडित का पुत्र वहा आया । पंडित ने अपने पुत्र को देखा तो फिरसे खुश हो कर वर्णन करने लगा राजा तुम्हारा यह पुत्र प्रत्यक्ष संसार में भगवत स्वरूप बड़ा होगा तब बनेगा ! राजा ने खुश होकर उसे दक्षिणा दी जो लेकर अपने पुत्रके साथ पंडित खुश होता हुआ अपने घर गया !! किन्तु इसी बात से चतुर राजा परेशान हुआ वह सोचता रहा जन्मकुंडली देख पंडित पहले हंसा फिर रोया फिर हंसा इसीमे जरुर कोई संदेह होगा !! इसी बात से चिंतित राजा ने रात को फिर पंडित को बुलाया । पंडित डर गया बोला मुजसे कुछ भूल हुई है क्या ! किन्तु राजा ने सांत्वना दी और कहा ऐसी कोई बात नहीं है किन्तु मुझे तुम्हारी जन्मकुंडली देखते समय की हुई चेष्टा ने शंका युक्त बनाया है क्योकि तुम पहले खुश होकर बोलते थे फिर आंख में आंसू लाये फिर तम्हारे पुत्र के आने बाद तुम ख़ुशी से वर्णन करने लगे यह बात से मेरा चतुर मन संदेह युक्ता हुआ है की ऐसा क्या हुआ है !!! यह बात सुन कर पंडित ने साँस ली और हंस पड़ा अरे इतनी सी बात है तो सुनो ! पंडित बोला " सुनो ! जब मै जन्मकुंडली देखता था तब मैंने देखा की यह बालक बड़ा हो कर एक भगवत स्वरूप बुध्ध बनेगा !मै खुश हो गया ओहो भगवान ने अवतार लिया !!किन्तु मै यह सोचने लगा की यह पहले तो सामान्य मनुष्य रहेगा और जब बुध्ध बनेगा तब तक तो मै मर जाऊंगा !!ओह !! मुझे इस जन्म में भगवान के दर्शन नहीं होंगे !! यह सोचते सोचते मेरी आँखों में पानी आ गया किन्तु जब मेरा पुत्र वहा आया तो उसे देखकर मुझे एक शांति मिली चलो मुझे नहीं तो मेरे पुत्र को तो भगवन के दर्शन होंगे वो मुजेही हुए क्योकि यही तो मेरा अंग है !!" 
बस इस बात को समज लेना है !!एक से होते है २ अमिबा सैल ! उनकी वृध्धि होती रहती है !!प्राणी भी एक से अनेक बनते रहते है ! क्या यह तरीका है आत्मा तत्व का फैलना !!ये पेड़ पौधे सभी हमें बहोत कुछ कह रहे है हमारे में छुपे कई प्रश्नों के उत्तर !!यह विज्ञानं या अज्ञान की बात नहीं है केवल है समज !!!


रविवार, 10 जनवरी 2010

आनंद करो !!




मंत्र शक्ति की विशिष्टता को कहते रहते थे।


उनके काम शास्त्री य रहे है । कर्मकांड विषय में शास्त्रमे अटूट श्रध्दा थी । और किसीके जप मंत्र बाकि रहे हो तो रातको जपते रहते थे और पुरे होने के सिवाय निद्रा नहीं लेते थे ! वो कहते थे कर्म में चोरी मत करो । यही उनकी शिख रही है। बोलुन्द्र में अपने वहा शिष्यों को पढ़ते थे। यह उन्होंने वड़ोदरा में भी जरी रख्खा था । वो कहते थे । पढ़ना और पढ़ना यह काम तो ब्रह्मिन का है ही ।







अकिंचित ब्रह्मनात्वं यह उनकी खूबी थी। डोंगरे महाराज के समकालीन एवं प्रन्षक थे । वो कहते थे सरलता एवं सामान्य मानव बनके जीना कठिन है लेकिन सही है। व्यथ प्रसिध्धि से दूर रहते थे। वो कहते थे प्रतिष्ठा सुवर की विष्ठा है !
उन्होंने एक बोर्ड लगाके रख्खा था प्रभु पर श्रध्दा रख्नर कदापि निराश थातो नथी । बस इसी चीज़ पर अड़े रहते थे वो । क्रोध को जितना जरुरी है । और कहते थे चलो मुझे क्रोधित करो मै तुम्हे इनाम दू !! मतलब सतत आनंद में रहना उसे जरुरी मानते थे। और अंतिम उपदेश भी कहा आनंद करो।
जीवन में एक उपदेश ये रहा है की हम मनुष्य है हमें मनुष्य  से आगे बढ़ कर देव योनि में जाना है !! इसीलिए उनके एक भजन में लिखा है --तू देव बन सतत देव की सेवा कर ते करते और अच्छे दैवी गुणों को बढ़ता चल !! यही गुण की दौलत और बढ़ती ही जाएँगी !!



मंत्र में बड़ी श्रध्दा थी किन्तु प्रक्टिकल भी उतने ही थे । उन्होंने एक श्रध्धालु जो उनके पास आया था । उसके आंख में बड़ा कष्ट था तुरंत शस्त्रक्रिया की जरुर थी लेकिन वो बोला मेरी कुंडली में देखो क्या है। उसी टाइम कहा पहले डाक्टर के पास जाओ । ज्योतिष तो शक्यता ओ का विज्ञानं है । अँधा श्रध्दा वालो को डात्ते रहते थे। जप मंत्र से आत्मबल बढ़ता है वो जरुर कहते थे और इसको एक वज्ञानिक दृष्टिकोण से समजते थे। सतत मत्रबल की मोवेमेंट चलते थे।

मृत्यु




मृत्यु के बारे में उनके विचार श्पष्ट थे । उन्होंने मृत्यु को एक सहज अलविदा जैसा एक भाग कहा है । खुद को हॉस्पिटल में अपने मृत्यु का खेल आया था वहा एक चिठ्ठी लिख के रख दी थी। कहता मुझे बड़े प्यार से विदे देनी होगी ।३मार्च १९८६ को उनका देहांत हुआ था। उन्होंने संस्कृत की सेवा में बड़ा योगदान दिया था। वादोदारामे संस्कृत विद्वाद परिषद् में कार्यरत थे। उनको दी हुई शोकांजलि प्रस्तुत है।