शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

वड़ोदरा में
















वड़ोदरा में उनको आना हुआ देश की आज़ादी हुई उसके करीब से। राज ज्योतिष थे उत्तर गुजरात के। अब यहाँ पंडितो में उन्होंने संस्कृत विद्वत सभा में कार्य में रत हुए । साथ साथ ज्योतिष की सेवा रही । उनके साथ महाशंकर भाई हरिशंकर जी उनके भाई परमानन्द भवानी शंकर सब ने मिलके शुरू किया था व्यास एंड कंपनी नामका व्यापर जिसमे दवाई यो एवं कागज खाने की चीजों का व्यापर भी था। किन्तु यह थोड़े साल चला ! अध्यात्मिक कार्य तो था ही। बोलुन्द्र में किये हुए अतिरुद्र में जो पूजा किया हुआ शिव लिंग था वह लेके आ ये थे। शरु में भुत दी जा पा के पास देव ज्योतिशालय था । फिर वहा से शामल बेचार की पोल में ए । उनका नाम सुनके उनके वहा राज्कपोर और नर्गिस भी ज्योतिष दिखाने ए थे। यही सम्बन्ध से वो चेम्बूर भी पृथ्वीराज के बुलवाने पर गए थे। और उनका फोरकास्टिंग सही हुआ था । इसी बातो से उनकी विशिष्टता और बढ़ी थी और भ्रुगुसम्हिता का अधर ले कर पुर जिंदगी का फल लिखने की उनकी पद्धति ने बड़ा नाम बनाया था । करीबी १९६५ देव ज्योतिशालय को लेके ए थे बा रा न पूरा में ! फिर वहा से हरनी रोड पर !यही उनकी यात्रा ज्योतिष कार्यालय की रही ! यही काम उनके पुत्र राजेन्द्रप्रसाद सम्हाल रहे है। उनके पुत्र किरीट भा इ भी कर्मकांड एवं ज्योतिष के काम में है । उनकी रत्ना परीक्षा के गुण ने पुत्र राकेश को जेमोलोजी में खीचा है इस तरह यह सेवा जरी रही है । आज युनिवेर्सिटी ग्रांट कमीशन का ७३ नंबर का विषय ज्योतिष बना रहा है ।

ज्योतिष के साथ कर्मकांड पूजा मै कई बड़े काम हुए थे.जिनमे पशाभई ट्रेक्टर कका प्रारंभ पूजा उन्होंने की थी जो आज हिंदुस्तान ट्रक्टर जैसी कंपनी है ।
यही था उनका ज्योतिष के प्रति दृष्टिकोण !!
देवज्योतिषालय को वड़ो दरा में लाये तब मिले पहले संस्कृत विद्यालय के प्रिंसिपल हरिप्रसाद महेता . जिनको  आगे चलके राष्ट्रपति से अवोर्ड मिला था उत्तम शिक्षक का !! उन्हीके हाथो से उद्घाटन हुआ वड़ोदरा में | यहाँ एक तस्वीर है जिसमे १९७१ में फॅमिली फोटो है |
मुझे  बिलकुल याद है उनमे श्रध्धा रखने वाले बहोत थे !! जो उनको गुरु मानते थे।  लेकिन गुरु गाड़ी जैसा  किया उन्होंने।  उनके आरोग्य के प्रश्न के कारण उनके एक शिष्य लक्मीनाथ  तिवारीजी  ने हम  बच्चो को बिठा कर उनके बदल भगवत सप्ताह किया था !यही उनके प्रति सद्भावनका प्रतिक है !!

वड़ोदरा   नाम पहेले  बड़ोदा  था।  अंग्रेजो ने बरोडा  कर दिया  था। पहले आये थे भतडी  ज़ाम्पा। फिर वहासे कार्य ले किया मांडवी के पास. विस्मणीय के खांचे मे. फिर आगे जाके चम्पाके पेड़ के पास विठ्ठल मंदिर के पीछे रहे देव ज्योतिषालय. उन दिनों में उनके पास आये  थे राजकपूर   नर्गिस !! ऐसे उनकी प्रसिद्धि बड़ी थी।
तीन मज़ले का मकान किराये पे था।  यहाँ से बरान पूरा  और उसके बाद हरणी  रोड पर कार्यालय लाया गया था।  जो आज राजेन्द्रप्रसाद व्यास अवं उनकी पुत्री जोषि  धारा  चला रहे है !

संस्कृत विद्वत सभा अवं पंडितो में बड़ा मान था  . कर्मकांड विषय में उनकी मास्टरी थी !


मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

शिव शिव


उनका जन्म हुआ तब नर सिंह दादा ने शिव की उपासना की थी । इसीलिए उनका नाम शिवशंकर रख्खा था ! वैसे तो उनकी जन्म राशी सिंह थी ! उन्हों ने खुद ने भी गाव के शिवालय में सतत धारा कर के अतिरुद्र करवाया था । कुटुंब में सबको वो दत्तबावनी शिवमहिम्न स्तोत्र एवं विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र सतत करवाते थे ! वो मानते थे की हम सब कोई अदृश्य शक्ति के निचे काम कर रहे है । उसकी मर्जी को मुनासिब समज कर आनंद से अपना कर्म करते रहो ।
 देव पंचायत की पूजा का महत्व कहते थे. नाम अक्षरों से   किसी  पंचायत से लाभ होगा यह निर्णय पर महत्व देते थे .