बुधवार, 9 दिसंबर 2009

घरडा बा


शिवशंकर के मातुश्री रुक्ष्मणि बा को सब घरडा बा हते थे! उनका अत्यन्त मातृभाव बहने वाला स्वाभाविक गुन शिव शंकर में ज्यादा खिल उठा था !!घरडा बा की बहन चकुबा  जो मासीबा कहलाती थी !! उनके पति कृष्णराम बापजी
थे !! आज भी कृष्णा श्रम बोलुन्द्रा में कार्यरत जिसे सम्हाल ते है अत्रेय  !!कृष्ण राम के तिन पुत्र गौरीशंकर
नर्मदाशंकर
गिरजाशंकर भी ज्योतिष कर्मकांड के विद्वान् थे . आज उनके नाम से हॉस्पिटल भी है !! उनके पुत्र सनातन अवं शतानन का काम है !

शुक्रवार, 8 मई 2009

बापा का अध्यात्म चिंतन

पेन्सिल में बनाया है यह उनका अध्यात्मिक चित्र है ।




समय की कठिनाई यो ने उन्हें पत्नियों का मरना एवं संतान पिता चाचा का मृत्यु इन सब ने सतत सांसारिक जिम्मेदारियों में डाला ही है । इसी कारण राज ज्योतिष पड़ छोड़ के वडोदरा आना हुआ । देवशंकर दादा का नम से देव ज्योतिषालय संस्था चलाई जो आज भी जिवंत है http://www.deojyotishalaya.com/


यही तो उनकी सातत्यता है । उन्होंने भूमा विद्या का जिक्र किया था। पतन में त्रिकम्लाल्जी महाराज से उन्होंने यह विद्या में रस लेना शुरू किया था । इस बात का कथन त्रिकं तत्त्व विलास के ग्रन्थ के प्रारम्भ में है । और यह बात जीवन के अन्तिम समय इसी भजन को सुनाने में निकली थी !


उनका पेन्सिल द्रोइंग चित्र में विशेषता है !यह चित्र उनके पुत्र राजेन्द्रप्रसाद ने बनाया है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

बापा















बापा नाम तो सब भाई यो में बड़ा होने से हुआ । उनके भजन उनकी दीर्घ दृष्टी उनकी हँसी भरा चहेरा ज्ञानकी बाते सहनशीलता शान्ति धीरज बड़े भाई का कर्तव्य संस्कृत कर्मकांड यह सब जिवंत था । कई उनके विद्यार्थी थे । उन्होंने ख़ुद कई भजन लिखे थे । वह कुछ http://www.astrowebindia.com/ । देखे जायेंगे ! अपने जीवन में पत्नी औ के मृत्यु एवं पिछले जीवन में जिम्मेदारियों ने बहोत कुछ परिवर्तन किए थे.वो राज ज्योतिषी थे । उत्तर गुजरात में मोहनपुर वदगम रानसन वगैरह राज्कुतुम्बो के कामो किए हुए थे ।


उनका इश्वर पर जो विस्वास है यह उनके लिखने में दीखता है !!








उनका राज ज्योतिष का समय कल बहोत ऊँचा था । उस ज़माने में उन्होंने सतत अपने कुटुंब में विद्या के महत्व को प्रस्थापित किया था । रमण  भाई को उस समय में इंग्लेंड भेजना  शिक्षा  प्राप्ति के लिए ! चाचा परसोत्तम पिता नरसिंह राम  नही थे।  चचेरा भाई भवानीशंकर  साहस  करना मानता था। बस इसी बात को लेकर विदेश का साहस क्र दिया था।  और वतान्प्रेम के कारन शिक्षा पूरी कर रमण भाई भारत में स्थिर हुए।
भानुभाई ,दह्याभई ,सुशिलाकाकी,शांतिलाल,भोगीलाल,चंद्रकांत भाई ,महाशंकर खड़े है।  निचे बैठे शिवशंकर ,रेवाशंकर ,रमणभाई ,रेवाबा ,भवानीशंकर ,उज़ीबाफोई की याद तस्वीर।