शिवशंकर कि माता का नाम था रूक्ष्मणि !!लेकिन हैम सब घरडा बा कहते थे। वो उम्र ८० के करीब चल बसे थे। मरते समय गर्मी के दिन थे . गांव में घुल रहना सामान्य बात थी। उन दिनों में सभी भाई वह उपस्थित थे . मृत्यु के अगले दिन सभी ने पूछा माँ तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है ? तो बा ने बताया " भगवन मुझे ब्रह्म मुहूर्त में मौत देना !! क्योकि गर्मी के दिनों में बच्चे स्मशान में आएंगे तो उनके पाव न जले !!!"
कौटुम्बिक कार्य ज्ञाति इन सबका बड़ा महत्व था उस ज़माने में। लोग प्रसंगों में हाजर रहने में गौरव मानते थे।
मणि बेन का पुत्र भानुप्रसाद कुकरवाड़ा में ज्योतिष कर्मकांड करते थे । शिवशंकर व्यास की ज्येष्ठ पुत्री मुक्ता बहन,निरंजना एवं शर्मिष्ठा कुकरवाड़ा में विवाह किया था।
रमन काका जनार्दनराय आनन्दी बहन व
પોતાના મસીયાઈ અને કૌટુંબિક ભાઈ ગૌરીશંકર મિત્ર સમ હતા
તેમના અવસાનથી દુઃખી શિવશંકર વ્યાસ ના હસ્તે લખાયેલ રચના.
જ્યોતિબેન ના લગ્ન સમયે બાપા
बोलुंद्रा में जो जgदीशभाई के घर के आगे शिव लिंग है वो भैशंकर दादा ले आए थे।जो लक्ष्मीशंकर को दत्तक गए थे।उनका जन्म शकाब्द 1803चैत्र कृष्ण 6 बुध बार को हुआ था ।उनकी जन्म कुंडली ।
भूमा विद्या का लगाव था शिवशंकर को। संसार में बिलकुल संसारी की तरह रहेना किन्तु बुध्धि को जोड़े रखना भूमा के ज्ञान से।
वो बार बार यही कहते रहते थे मैंने इस जीवन में तिन भाग देखे है। अगर मर जाऊ तो तो मौत ऐसी हो। इस प्रकार दैहिक दिमाग दोनों पर १० दिन कष्ट से गुजरे और आखिर दिन ऐसे हुए के सबसे बात की प्रभु भजन किये और अपने की हाजरी में सबको शुभाशीष देते हुए देह त्याग किया। यह भूमा सिध्धि जिसको समज ए वो समज शके।
भूमा और अल्प !!
उन्होंने त्रिकेम तत्व विलास नमक ग्रन्थ में प्रस्तावना लिखी है !
अपने भजन भी लिखे है । उसमे सेसे एक भजन कि पंक्ति यह है !!
गुरु के अंतर्बाह्य कि कल्पना अद्भुत थी !
मुझे उनके अंत काल के दिन गुरु के प्रति स्मरण भावना देख आश्चर्य हुआ !! पाटण आश्रम में त्रिकम लालजी की बाातेे । यही उभर आया था !!
बोलुन्द्रा एक समय में गुजरात का काशी कहलाता था । बोलुन्द्र की सुबह में चारो और छात्रो के मंत्र गूंजते थे ! हरेक अपने घर छात्रो को रखते थे और शिक्षा देते रहते थे !! यही शिक्षा की सेवा थी ।आज भी चल रही है !!बोलुन्द्र में पाठशाला आत्रेय जैमिनी व्यास श्री कृष्णाश्रम में चला रहे है ! अवं राजेन्द्रप्रसाद शिवशंकर कौशाम्भ सेवा के नाम से शिक्षण के विषय में विकास कर रहे है !! बोलुन्द्रा स्कुल में परमानन्द का डोनेशन है !! शिक्षा संस्कृति का विकास यह मंत्र आज भी चल रहा है !!
मुख्य आमदनी कर्मकांड पूजा से है अत: इन्ही मार्ग से यजमानो की सेवा होती रहती है !! आज भी इसी लिए सभी बोलुन्द्रा पंडित और उनके भांजे बहने स्नेही सम्बन्धी से एक ही आवाज़ है लव बोलुन्द्रा !!
शिवशंकरजी का एक ही आवाज़ था सभी प्रभु के नाम में समा जाता है !!उनकी डायरी का सन 19२9 का पन्ना भी यही बोलता है !! आज भी बापजी की आवाज़ आज भी गूंजती है तू ही तुही राम भज मन राम तज मन काम बोल जीवड़ा राम !! 1 9 2 9
यही धारा बहती ही रहेंगी !!
कर्म कांड का मूल कल्प शास्त्र से है ।शिक्षा कल्प व्याकरण ज्योतिष निरुक्त और छंद । ये छह वेदांग है । कई लोग कर्मकांड के अर्धज्ञानी पंडित से सही समझ नही पाते है ।और ये आध्यात्मिक देह की आधिभौतिक प्रक्रिया के पीछे रही आधिदैविक स्थिति जान कैसे पा सकते है ।कभी कभी लगता है जो अंधश्रद्धालु लोग दिखते है उन्हों ने अनजाने में ही हीरा सम्हाल रख्खा है । पूरे बोलुँद्रा के पंडित में एक दो को बाद करते ज्यादातर ने कर्मकांड को धंधा समजा। युक्ति और ज्ञान में फर्क है । युक्ति को श्रेष्ठ मानना मन निर्बलता का लक्षण है । कुछ लोगो ने खुद ने इसमें विश्वास न रख कर केवल वितंडावाद किया । अपने बच्चों को खुद अलग विषयो में ले गए । यह दुखद है ।
उनके गुरु त्रिकम लाल जी जो पाटण में थे । उनके पास से भूमा विद्या की बात पकड़ ली थी ! और सतत भूमा विद्या के बारे में सोचते रहते थे । लेकिन एक कॉमन संसारी की तरह ही जीते थे । लेकिन इसी विषय में बड़े पंडितो के सिवा किसका काम ना था इसी लिए ज्यादातर इसकी चर्चा में नहीं दिखाई देते थे । मिथ्या वाद विवाद से दूर रहते थे । किन्तु उनके काव्य एवं भजनों में यह बात छुपी नहीं रहती !! यह बात नेट पर एस्ट्रोवेबइण्डिया में बताई है ।
એક જોકર નામ નું મુવી છે.તેમાં ગામડા ના માણસો માં એક માણસ ને એલિયન ની ભાષા આવડતી હોય છે.જે ગાંડા જેવી ચેષ્ટા ના કારણે તે સામાન્ય માણસ માં ગણાતો હોય છે.મુવી ના અંતે જ્યારે સાચો એલિયન આવે છે ત્યારે પુરા ગામ ને વાર્તાલાપ કરવા મા આ વ્યક્તિ જ કામ માં લાગે છે.
બસ આવું જ કઈ ભૂમા વિદ્યા નું છે. યાજ્ઞવલ્કય ની વાતો માં સમજાય છે.સહજ સમાધિ !! મારા પિતાજી એ તેમના છેલ્લા દિવસો માં તેમના ભજનો ત્રિકમ તત્વ વિલાસ આ બધું જ સાંભર્યું . તેમના ભજન કાવ્ય માં અવલંબન વિણ ચિત્ત અચેતન થયું સહજ પ્રયાસે...એ પંક્તિ ઘણી જ ઉંચી છે.બસ અહીં ની ખૂબી એવી છે જયાં સુધી એલિયન ન આવે ત્યાં સુધી ની દશા કેવી!! તેથી જ સામાન્ય સંસારી માફક જીવી લે તો જ સમય પસાર થાય. નરસિંહ મહેતા અને અખા ને કોઈ કોઈ જ સમજે છે. ના સમજ ને તે સમજવા ની જરૂર જણાઇ જ નથી તેથી તેઓ પર પ્રેમ કે તિરસ્કાર નો પ્રશ્ન રહેતો જ નથી.
मुध्रणेश्वर महादेव
उन्होंने जादर उत्तर गुजरात में शिवमंदिर है जो मुध्रने श्वर अर्थात मूर्धनीश्वर कहेलाते है ।उनकी स्तुति रचना की थी जो संसकृत विद्यालय एम् एस यूनिवर्सिटी के अंक सुरभारती में प्रसिध्ध हुई थी ।
भूमा विद्या में संसार में एक सामान्य सांसारिक जैसा ही जीवन होते हुए जीवात्मा सतत परमात्म चिंतन में जुडा हुआ रहता है ! अतः उसको पहचानना कठिन है ! क्योकि वो सब के जैसा ही संसारी है !! खूबी सिर्फ इतनी है की उस पर ए हुए दुःख सुख को सहज ले लेता है | उनके काव्य में
"अवलंबन विण चित्त अचेतन थयु सहज प्रयासे "
यहाँ कोई भी अवलंबन लिए बिना सहजता से चित्त को अचेतन कर लेने की खूबी भरी बात है !! यही तो है भूमा विद्या का रहस्य !!!यह भजन में उनकी अन्दर की भावना स्पष्ट होती है !! पाटन उत्तर गुजरात में है .। उनके भी शिष्य थे भाईशंकर महाराज कुकर वाडा गाव में |